प्रेम की परिभाषा

प्रेम की परिभाषा

प्रेम कोई शब्द नहीं,
जो किताबों में मिल जाए,
यह तो वो एहसास है,
जो खामोशी में खिल जाए।

प्रेम कोई सौदा नहीं,
जो मोल-भाव से पाया जाए,
यह तो वो रिश्ता है,
जो बिना शर्त निभाया जाए।

जब धूप तेज़ जलती हो,
वो छाँव बनकर ढल जाए,
जब राहें मुश्किल लगें,
वो हाथ पकड़ संभाल जाए।

प्रेम आँधी में दिया है,
जो हर हाल में जलता है,
यह वो सागर है गहरा,
जो चुपचाप सब सहता है।

न इसमें कोई स्वार्थ हो,
न कोई छलावा हो,
बस सच्चाई की खुशबू हो,
और विश्वास की छाया हो।

माँ की ममता सा कोमल,
पिता के साये सा मज़बूत,
दोस्त की हँसी सा सच्चा,
और साथी सा अटूट।

प्रेम त्याग भी सिखाता है,
और अपनापन भी देता है,
यह टूटे दिल को जोड़कर,
जीने का साहस देता है।

न दूरी इसे कम करती,
न वक्त इसे मिटा पाता,
यह दिल से दिल का बंधन है,
जो जन्मों तक निभ जाता।

प्रेम अगर सच्चा हो,
तो दुनिया भी झुक जाती है,
दो धड़कनों की ताल पर,
नई कहानी बन जाती है।

प्रेम ही जीवन की रौशनी,
प्रेम ही हर साँस का सार,
जिसने प्रेम को जान लिया,
उसने पा लिया संसार।

_Lalak Bagdiya