मेरे दिल का मकान
तु दिल से उतरता तो नहीं
पर उभरता बहुत है
तु दिखने नहीं देता कभी
पर इतरता बहुत है
तु नजरें मिलाता तो नहीं है
पर हटाने भी नहीं देता है
मेरे दिल के मकान पे
तु ऐसा कब्जा जमाये बैठा है
किराया भी नहीं देता
खाली भी नहीं करता है
तुझे जाने को केह भी नहीं सकती
तेरे बिना रह भी नहीं सकती
के मेरे दिल के जिस मकान में तु लिये बसेरा बैठा रहता है
मै रात रात भर बाहर बैठु जब तक बत्ती बुझती नहीं है तेरे मकान की
ये सोच सोच कर पागल हो जाऊ क्युं इतनी जरुरत है मुझे इस इनसान की
तु खत किसी और को लिखता है सहर होने तक
कौन क्युं किस लिए ये सोचती रहती हु मै दिमाग में खयालों का कहर होने तक
मै सोचती हूँ कभी कभी तुझे बाहर घर से निकाल दु अभी
पर ये भी सोचती हूँ तु ना हो तो कैसे भरेगी तेरी कमी
तु मकान में मेरे रहता है
किराया किसी और को देता है
मेरा नमक खाकर तु किसी और के दावत की तारीफे सुनाता है
पता नहीं मेरी रंजिशों में तु कौनसी खुशीयां पाता है
फिर भी न जाने क्यों मै खुद को तेरी दहलीज पे खड़ा हुआ पाती हु हर बार
जवाब मालुम होने के बावजूद भी मांगती हूँ किराये में थोडासा प्यार
मै तेरे घर के बाहर गेडीया मारती रहु
तु दोस्ती की बेडीया डालता रहे
खुद को कुछ हिस्सों में बाट लेती हु
तुझे फोन मिलाकर काट देती हु
तु किसी और की जायदाद है ये भी मानती हु मै
मेरा कुछ हिस्सा नहीं है ये जानती हु मै
मै कहा केह रही हु आजा मेरे हिस्से में
मै कहा रहीं हु तु बनजा प्यार की दास्ताँ मेरी कहानी के किस्से में
तु बस मेरी आँखों के सामने रहना जो बातें मै तुमसे करना चाहु वो तुम किसी और से केहना
तुम बोलते रहो मै सुनती रहु
ताउम्र ऐसे ही ख्वाब झूठे बुनती रहुँ
तु मेरा नहीं ये जानके भी तेरे करिब आकर खुद को सजा देती हु
आज जज्बात स्याही मे बह गये बस इतना केह के रजा लेती हूँ
_Gayatri Bhamare
