मैं अर्श से गिरा हुआ

मैं अर्श से गिरा हुआ
मैं अर्श से गिरा हुआ,
मैं फ़र्श पे पड़ा हुआ,
कि इस जहाँ में आज तक,
ख़्वाब सा सजा हुआ।

देख सबकी शोहरतें,
और अपनी बर्बादियाँ,
न जाने कौन-कौन सी,
आग में जला हुआ।

कभी तो वक़्त आएगा,
कि मुझसे कहलवाएगा,
कि मेरी ज़िद के सामने,
वो ख़ुदा भी है डरा हुआ।

किसी की तो है कल्पना,
कि इस स्वप्न को सच किया,
मैं एक बीज समर का हूँ,
जो ख़ाक में दबा हुआ।

लहू-लहू में भी खड़ा,
उम्मीद खेलता हुआ,
मैं ढीठ सा सिपाही हूँ,
शिकस्त झेलता हुआ।
मैं अर्श से गिरा हुआ…

_Amit Kumar Gangle