तू क्यूँ अपना लगता है

सूना–सूना लगता है
दरिया सहरा लगता है

सबसे वहशत है मुझको
तू क्यूँ अपना लगता है

फिर से हंसकर पागल बोल
मुझको अच्छा लगता है

तेरे होंठ को चूमने बाद
मीठा फीका लगता है

आज गले मिलकर के तुझसे
दिल ये खोया लगता है

तू ख़्वाबों में आती है
कोई रिश्ता लगता है

तू भी मुझको चाहती है
मुझको ऐसा लगता है

इतनी अच्छी शायरी ‘वहशी’
इश्क़ पुराना लगता है

         _Azhan Wahshi