कुछ कहने को मिल जाता तो
कितनी खूबसूरती से बिताये थे
वो पल जिनमें तुम मुस्कुराये थे।
कहने को तोह काफी थे वो दिन
किसको पता था वो लौट कर ना आएंगे।
अब बिखरी हुई हूँ मैं इन्हीं यादों में
जो कहते हैं तुम कहीं पास ही हो।
हाँ माना कि तुमसे कुछ बोला था
जिसने मचाया था तुम्हाेर दिल में शोर।
जिन आँखों में मैं देखना चाहूँ
उन्हें देख तो लेती हूँ तस्वीरों में।
अब साथ खड़े नहीं होते तुम
क्योंकि मुझ से कुछ बोल नहीं सकते।
हाथ में हाथ था,
सांसों में साँस।
कहने को तो अब भी है पास सांसे
पर तुम नहीं हो।
ये जो सीने में दर्द है अब
वो पहले प्यारा लगता था।
रंगों में खून तेज,
पर दिल में सुकून था।
बातें होती हैं अब भी
पहले जो होती थीं
पर किस्से बदल गए हैं
और जिनसे मैं उनको कहती थी।
जिस दिन मुझे तुम मिले थे
उस दिन लगा जैसे दुनिया,
जो गोल होकर भी गोल नहीं है,
उसमें मेेर लिए भी कोई बना है।
चेहेर पे मुस्कान लिए,
और छाती पर फूल,
वो मेेर लिए मेेर सामने खड़ा है।
और वो मुस्कान भी क्या मुस्कान थी,
जैसे मुझे हँसाने के लिए ही बनी थी।
जैसे मेरा घर, मेरा मकान थी
जहाँ मैं सालों रहलूँ बिना किराया दिए।
क्योंकि मुझे देने को तैयार थे तुम अपना दिल लिए।
खैर अब तो वक़्त गुज़र गया है
तुम आगे कहीं फुर्ती से भाग गए हो।
मेेर बस में नहीं है
अब तुम तक पहुँचना।
तुम थे मेेर साथ कभी
और मैं तुम्हाेर कभी
बस ये याद रखना।
दूसरों का क्या है?
वो तो आते-जाते हैं।
कान में मीठी बातें
फुसफुसा जाते हैं।
पर क्योंकि मैं तुमको भूली नहीं,
जो रिश्ता हमारा टूटा उसको छोड़ी नहीं,
मैं आ नहीं पाती हूँ
उनके दिल में और ना उनको
अपने दिल में उतार पाती हूँ।
बस क्यों कि तुम्हारी जगह कोई और चाहिए नहीं।
जानती हूँ तुम हो तो इस दुनिया में ही।
कभी इत्तेफ़ाक़ से मिल जाओ कहीं
तो पूछ सकूँ कि
कैसे देखूं उनकी आँखों में
और कह दूँ कि मुझे प्यार है
अगर उनमें तुम नहीं जो मेेर साथ हैं?
-श्रेष्ठा अग्रहरी
