-मुसाफ़िर-
मैं ठहरा एक मुसाफ़िर
जो अकेला चलता रहा,
तेरी यादों के साये में
हर लम्हा मैं जलता रहा।
चाहा था तेरा साथ,
तेरी बाहों की छाँव को,
मगर तक़दीर के तूफानों में
ये दिल मचलता रहा।
तेरी मोहब्बत की राहों में
जो ख्वाब बोए थे कभी,
पर हकीकत की आँधियों में
वो सब कुछ ढलता रहा।
अब भी तेरी आहट पे क्यों
धड़कता है ये दिल मेरा,
तुझसे आती हर खुशबू से
ये दिल भी संभलता रहा।
बैठा हूँ अब तक उस राह में
तेरी लौटने की आस में,
तू न लौट आई अभी तक
बस ये दिन बदलता रहा।
_Mahendra kumar Behera
