रूहानी नज़राना

निहारूँ उसे निशब्द मैं, जैसे कोई आयत नूरानी हो,
पंखुड़ी की ओस में, सिमटी एक रूहानी कहानी हो।
वो शाख पर खिलता हुआ, कुदरत का नज़राना है,
बिन छुए उसे पूजना ही, मेरा हसीन अफ़साना है।
नहीं! उसे तोड़ना, मेरी मोहब्बत की हार होगी,
जड़ से जुदा करना, मासूम रूह पर तलवार होगी।
खौफ है—मेरा लम्स कहीं उसकी नफ़ासत का गुनाह न बने,
जो पाक इबादत थी, वो हवस की कोई पनाह न बने।
ज़माना वस्ल को प्यास कहे, मैं इस दूरी को ईमान कहता हूँ,
जो बिन छुए रूह महका दे, उसे ही अपना भगवान कहता हूँ।
हमारे दरमियाँ ये फ़ासला ही, मेरी जीत का निशान है,
बिना मिलावट का ये इश्क़ ही, मेरा तूफान और जहान है!

                                   लेखक :- अक्षय शर्मा©