अनकही बातें

सुलझी हुई बातें अपना अतीत बयान करती थी,
हर बातें उसकी अनजानी सी क्यों लगती थी।
मनमोहित कर देती बातें उसकी,
मन ही मन वो क्यों अपनों जैसी लगती थी।
दर्द और सुकून से भरे पल थे उसके,
जिस में जी रहे हम आज और कल ।
पल भर के दिन ऐसे गुज़र जाते, की पता ही नहीं लगता क्या आज है तो क्या कल ।
                                            _स्तुति