एक खत उसके नाम
अंधेरी सी जदगी मरोशनी नज़र आई,
पतझड़ केमौसम मवो बहार सी नजर आई ।
वो पराय मकुछ अपनी सी नजर आई,
वो आम होतेहुए कुछ खास नजर आई ।।
बा त क हम्मत न थी खत का इरादा कया,
लि खना चाहा प्यार जो क बहुत ज्यादा कया।
लि ख दए जज़्बात और साथ रहनेका वादा कया ,
फि र क्या बस अब खत देनेका इरादा कया।।
फि र नकल गए ददार को काम का बहाना लए,
ना म था उनका दल मऔर खुशी का तराना लए।
प्या र भरेखत मसफ उनका अफसाना लए,
आखि र पहुंचेमंजल को खत देनेका इरादा लए ।।
मी लों केसफर क थोड़ी सी थकान थी,
खत पहुंचाना जरूरी था आखर वो मेरी जान थी ।
वो भी हुस्न क मलका थी यही उसक पहचान थी,
वक्त न था उनकेपास एक नाचीज़ क यही शान थी।।
टूटे दल सेखत को तूक्या पढ़ता हैऐ “हुजैफा”
,
तेरे लए कोई नई नह बस एक आम सी तो बात थी।।
_Huzaifa Khan
