इश्क़_के_समीकरण
गणित की कक्षा में,
इक अजब मसअला हल हो रहा था,
कि तुमने देख कर मुस्कुराया,
और इश्क़ का नया फलसफा चल रहा था।
समीकरण हल करने बैठा था,
पर नज़रें तेरी मश्क में उलझ गईं,
कभी गुणा, कभी भाग करता रहा,
पर मोहब्बत की कसौटी पर शून्य में सुलझ गईं।
तेरी तालीम में जो बँटा,
वो मेरे दिल का परिमाण था,
तेरे जज़्बों की त्रिज्या में,
मेरा इश्क़ बस एक लघुतम समापवर्तक था।
तू बिंदु-बिंदु समझाती रही,
मैं बेतरतीब रेखा सा बिगड़ता रहा,
तू मूल में रखती रही,
मैं चर-अचर सा तेरा हल ढूंढता रहा।
तूने कहा— “तर्क से चलो,
हर सवाल का हल होता है,”
पर तेरी आँखों में देखा जब,
हर प्रमेय ही असंगत होता है।
तेरी बातों में गणित थी,
मेरे दिल में बस प्रेम,
तू समीकरणों में उलझी रही,
मैं तेरे इश्क़ का परिमेय बन गया।
गणना की हर कोशिश बेकार गई,
तेरे इश्क़ का कोई सूत्र न मिला,
बस तेरी एक मुस्कान ही काफ़ी थी,
जो जीवन के हर प्रमेय से बड़ा निकला।
_Gaurav Verma
