टकराव: सादा मगर गहरा |

(लड़का)
जरा सा देखकर चलते, तो ये नुकसान न होता,
मेरे हाथों में ये बिखरा हुआ सामान न होता।
कहाँ खोई हुईथीं आप, कुछ तो गौर करतीं तुम,
यूँबीच रस्ते में मेरा, ये इम्तिहान न होता।
(लड़की)
माफीचाहती हूँ मैं, ज़रा जल्दी में थी शायद,
नज़र उलझी थी रस्ते में, मगर दिल कहींथा शायद ।
मदद में कर रही हूँ ना, ये सारे पन्ने चुनती हूँ, किस्सा था जोबिखरा सा,उसे फिर से बुनती हूँ।
(लड़का)
हटाओ हाथ रहने दो,मैं खुद ही समेट लूँगा,
तुम्हारी इन खताओं को,मैं खुद ही सहेज लूँगा।
मगर ये तो बताओ तुम, कि आँखें क्यूँगुलाबी हैं?
ये टक्कर ‘एक्सीडेंट’है, या नीयत ही शराबी है ?

(लड़की) (मुस्कुराते हुए)
शराबी आँखें होती तो, मैं कब की गिर गई होती,
तुम्हारी इन बातों में,कहीं पर बह गई होती।
कमाल करते हो तुम भी, शिकायत भी,मोहब्बत भी?
अजीब हैमिजाज आपका, अदावत भी, शराफत भी।
(लड़का)
अदावत छोड़िए साहिब, ये पन्ने अब गवाह हैं,
कि आपकी इस ठोकर से, मेरी शामें तबाह हैं।
मगर कागज़ ये जो बिखरी, वो इक अधूरी नज़्म थी,
तुम्हारे आने से लगता है, उसमें जान आ गई।
(लड़की)
तो क्या समझा जाए इसे,कि ये रंजिश नहीं कोई?
टकरा कर जो हम रुके, वो साजिश नहीं कोई?
अगर ये नज़्म मेरी है, तोफिर से लिखो इसे तुम,
किसी कॉफ़ी के प्याले पर, ज़रा सा पढ़ी इसे तुम।

(लड़का)
चलो मंजूर है ये भी, बहाना तुम ने ढूँढा है,
गिरे कागज़ उठाने में, ठिकाना तुम ने ढूँढा है।
चलो अब साथ चलते हैं, उसी कैफ़े की मेज़ तक,
इत्तेफाक को ले जाते हैं, मोहब्बत की दहलीज़ तक ।
(लड़की)
तो कॉफ़ी की मेज़ पर अब,कुछ और भी रख लेते हैं,
गिरी हुई नज़्म के साथ, एक किस्सा भी रख लेते हैं।
तुम लिखो मैं सुनें,और फिर कुछ यूँकह जाऊँ,
कि अगली बार टकराएँगे, तो गिरने का बहाना बनाऊँ ।
(लड़का)
अगर अगली बार फिर से गिरना, तुम्हारा इरादा है,
तो मेरा हाथ तैयार है, बस इतना वादा है।
काग़ज़, स्याही और वो नज़्म, सब गवाह रहेंगे,
कि शुरुआत एक टक्कर से थी – अब लम्हे गवाह रहेंगे।

~सत्यम
_soulof.satna