बेटी का अधिकार

बेटी बोझ नहीं, घर की शान है,
ममता की धूप, जीवन की पहचान है।
उसके सपनों को पंख लगाओ,
घर आंगन में खुशियाँ खिलाओ।
न डर की छाया, न आँसू की राह,
उसे दो हक़, दो सम्मान की चाह।
कलम भी उसकी, ताज भी उसका,
हर मंज़िल पर हो राज भी उसका।
मत बाँटो उसे रिवाज़ो की जंजीरों में,
उसे उड़ने दो खुले आसमानों में।
आज नहीं तो कल बदलेगा इतिहास
जब बेटी बनेगी बदलाव की धार।
आओ मिलकर ये वादा निभाएँ,
बेटी को जीने का हक़ दिलाएँ।
शिक्षा, सुरक्षा, सम्मान दिलाओ,
बेटी को उसका अधिकार दिलाओ,

       अंकित प्रधान
       जौनसार बावर चकराता