गुम रास्ते की राह
जब-जब तुम्हें सरहाने का मन करे,
तब-तब सजदा किया करती हूँ।
जब-जब तुम्हें देखने का दिल किया करे,
तब-तब आँखें बंद कर लिया करती हूँ।
तुम पर आज भी बार-बार इश्क़ बरस जाता है,
तुम्हारी मौजूदगी के फ़रेब में फिसलते-फिसलते
फ़ना हो जाती हूँ।
जितने नखरे तुमने अपनी मोहब्बत में दिखाए थे,
आज उतने बहाने मैं अपने अश्कों से लड़ने में
किया करती हूँ।
परंतु वो कहते हैं न—
जहाँ रोशनी नहीं पहुँचती,
वहाँ दुआएँ पहुँच जाती हैं।
जहाँ तुमसे मिलना मुमकिन नहीं,
वहाँ तुम्हारी यादों से रूबरू हो जाती हूँ।
तुम्हारी दिशा को पाना ही मेरी आरज़ू है,
बिखरे दिल को दिलासा ज़रूर है।
बुझी हुई ज्योत में जाग रही एक आस अटल है—
गुम रास्ते की राह का राज़ यही है।
जहाँ मेरे पाँव न पहुँच पाएँ,
जहाँ हमारी परछाई कोई चुरा न सके,
जहाँ निमित्त नियति भी निर्बल हो चुकी हो—
मिलूँगी मैं वहाँ तुमसे, सभी आयामों परे।
–Krishnavi
