सच्चाई से तुम क्यों भागते हो...
सच्चाई से तुम क्यों भागते हो झूठ से तुम क्यों नहीं जागते हो, लिपटे हो तुम झूठ की पोटली में आनंदित हो तुम अंधकार की कोठरी में। सिमटे जा रहे हो तुम्हे पता नही निकल के देखो इस जीवन में कही, अंधकार सब जगह तुम्हे दिख जायेगा अस्तित्व तुम्हारा बिक जायेगा। जब जब प्रपंच में खोओगे मस्तिष्क पकड़ कर रोओगे, ढक जायेगा ईमान तेरा बिक जायेगा विमान तेरा। तुझपर सब हस्ते जायेंगे तेरी प्रसन्नता खाएंगे, इस झूठ से तुम क्यों नही जागते हो सच्चाई से तुम क्यों भागते हो। चाह को जब कर दोगे नष्ट दूर होंगे तब सारे कष्ट, जिस पीड़ा में तुम उलझ रहे हो द्वेष आग में झुलस रहे हो, मोह माया जब बिक जायेगी सुख की अग्रिम चिंगारिया दिख जाएंगी।
अब नवल प्रभात का सूरज उग रहा है ईर्ष्या, मोह का अंधकार अब डूब रहा है, अब समय आ गया सफलता को पाने का सुख चैन की रोटी खाने का।
फिर तुम क्यों ईश्वर से भीख मांगते हो, झूठ से तुम क्यों नही जागते हो सच्चाई से तुम क्यों भागते हो।
-Umakant dangi
