आख़िरी आलिंगन
आज हमारी आख़िरी मुलाक़ात थी,
हम दोनों जानते थे…
शायद आज के बाद
न बात होगी,
न एक झलक नसीब होगी।
उसी पल उसने धीमे से कहा —
“क्या हम एक आख़िरी बार गले मिल सकते हैं?”
ये सुनते ही लगा
जैसे मेरी आख़िरी ख्वाहिश पूरी हो गई हो…
क्योंकि वो सिर्फ एक हग नहीं था,
वो साथ बिताए हर लम्हे को समेट लेना था।
जो सपने हमने आने वाले कल के लिए देखे थे,
उन्हें आज उसी मोड़ पर छोड़ देना था।
ज़िंदगी हम पर थोड़ी बेरहम ज़रूर रही,
पर उसने खुश रहने के बहाने भी
भर-भर के दिए थे…
और जब हम अलग हुए,
तो हाथ तो छूट गए,
पर दिल अब भी वहीँ ठहरा रहा —
उस आख़िरी आलिंगन में…
जहाँ मोहब्बत खत्म नहीं हुई,
बस मुकम्मल हो गई।
– swapnali Khadake
