हवा शमा जलाना चाहती थी...

दोनों सही थे, किसी की गलती नहीं थी,
हवा शमा जलाना चाहती थी पर वो जलती नहीं थी।
दर्द ना होने का भेद मालूम हुआ हमे,
चोट लगने पर भी अब तो चोट लगती नहीं थी।
उसके साथ दर्द ने भी छोडा था, साथ हमारा,
ये बात भी हमे अब बहारों सी चूभती नहीं थी।
हर रिश्ते से किनारा कर लिया था मेने,
मेरी आंख अब उसे ख्वाब में बुलाती नहीं थी।
सन्नाटे का शिकार हो जाते थे मेरे अल्फ़ाज़,
जब, महफिल मेरी खामोशी को कान लगाकर सुनती नहीं थी।
जिंदगी कभी उल्फत से पेश नहीं आई हमसे,
ओर मौत भी हमसे महोबत जताती नहीं थी।

सोलंकी राकेश

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