प्रेम: एक पूर्ण विस्तार

प्रेम अथ है, प्रेम में यति नहीं,
प्रेम कर्मशील है,
प्रेम में कोई गति भी नहीं,
प्रेम स्थिर है, प्रेम प्रगाढ़ सा
प्रेम में तृष्णा है, लिप्सा है
प्रेम में विनोद है,प्रेम में क्रंदन भी|

प्रेम दृष्टि है, प्रेम द्रष्टा भी
प्रेम सृष्टि है, प्रेम स्रष्टा भी
प्रेम प्रगल्भ है, प्रेम उपालंभ सा
प्रेम में संध्या है, प्रेम प्रभात भी|

प्रेम निश्चित है, प्रेम क्षणिक भी
प्रेम प्रार्थना है, प्रेम अभिशाप भी
प्रेम प्रतीक्षा है, प्रेम अधैर्य भी
प्रेम सुविधा है, प्रेम असुविधा भी|

प्रेम प्रतिष्ठा है, प्रेम अपमान भी
प्रेम ताकत है, प्रेम अबला भी
प्रेम प्राचीन सा, प्रेम नवीन सा
प्रेम उज्ज्वल है, प्रेम रजनी भी
प्रेम संपदा सा, प्रेम भिक्षा भी |

जो भी हो,
प्रेम शाश्वत है
प्रेम के हैं सहस्र परिभाषाएं
लेकिन प्रेम वैकल्पिक नहीं , प्राथमिक है
प्रेम अदृश्य है , लेकिन एक दार्शनिक है
प्रेम को कितना परिभाषित करूं
बस ये समझ लो,
प्रेम ईश्वर है , साध्य है
प्रेम अनंत भी |
                     – श्रुति मिश्रा