“एक इल्तिज़ा”
गौर कर कभी हमारे रिश्तों पर भी,
क्या था और अब क्या-क्या न हो जाए,,
इससे पहले के ताल्लुक में दरारें आ जाएं,
आ कहीं मिलते हैं ताकि बहारें आ जाएं,,
नागवार है तेरा जानबूझकर अनदेखापन,
है अगर मोहब्बत तो तू निभाने आ जाए,,
ज़िंदगी है जो अब गुजारी नहीं जाती,
इससे पहले कि मैं ना रहूं तू सामने आ जाए,,
पास होकर भी अब हम पास नहीं,
एक इल्तिज़ा है कि हम मिले और कतारें आ जाएं,,
ये भी मुमकिन है के किसी रोज़ सुबह ना हो,
इससे पहले ही हम मिले और मज़ारें आ जाएं,,
रिश्ते मसाफ़त से पहले ख़त्म हो न जाएं!
काश मैं पुकारूं और तू मनाने आ जाए!!
-Prakash bahadur chaudhary
