प्रेम ही ईश्वर है

जब प्रेम ईश्वर के रंग में ढलता है,
मन कमल-सा निर्मल खिलता है।
अंतर की गहराई में उतरकर,
हर स्वांस ईश्वर का नाम लेता है।

प्रेम का मार्ग सरल भी है, कठिन भी,
यह त्याग का पथ है, यह समर्पण भी।
जो इस राह पर निस्वार्थ चल पड़ता है,
वही ईश्वर को अपने भीतर पाता है।

कृष्ण के अविरल प्रेम में राधा,
जीवन भर प्रतीक्षा करती है,
विरह की अग्नि में जलकर भी,
प्रेम की ज्योति अमर रखती है।

ईश्वर के प्रेम में बहता हर अश्रु,
मोती बनकर आत्मा में सजता है।
दर्द भी फिर वरदान-सा लगता,
जब विश्वास हृदय में बसता है।

प्रेम का अविरल पावन मार्ग,
ईश्वर तक ले जाने वाला सेतु है,
न कोई दूरी, न कोई बंधन,
बस समर्पण ही उसका हेतु है।

प्रेम में डूबी आत्मा जब,
कान्हा से मिल जाती है,
अंतर्मन की हर धड़कन फिर,
केवल “श्याम” ही गुनगुनाती है।

सुदामा का विश्वास निराला,
मित्रता का सच्चा मान है,
निस्वार्थ भाव से जुड़ा हुआ,
वही प्रेम का पहचान है।

प्रेम ही वह पावन पथ है,
जो ईश्वर तक ले जाता है,
न द्वेष, न कोई अहंकार,
बस आत्मा को निर्मल बनाता है।

जीवन रूपी इस नाजुक नाव में,
भक्ति ही पतवार बन जाती है,
प्रेम ही आधार, विश्वास ही सार,
जो अंततः ईश्वर तक पहुंचाती है।

गौरी का अटूट समर्पण,
शंकर का असीम स्नेह अपार,
सारे जग से लड़ जाने वाला,
यही प्रेम का सच्चा आकार।

प्रेम ही जीवन का सच्चा सत्य,
प्रेम ही संपूर्ण विश्वास है,
जिसने प्रेम को जान लिया,
वही ईश्वर के पास है।

-चारू पाण्डेय