गुस्ताख़ी
गुस्ताख़ी की निगाहों ने मेरी
आपकी बेपर्दा शख्सियत को निहारने की
वार सीधा दिल पे हुई
जो हर पल आपकी निगरानी में जुटी
मुस्कुराहट आपकी जो पर्वत को पिघला दे
जगमगाहट ऐसी जो सूर्य को शीत कर दे
समय भी देख के आपको हो जाता स्थगित
आसमान भी सामने आपके है सीमित
सिर्फ खिड़की से छिप छिप के देखती रही
एक झलक आपकी पाकर आहें भरती
थोड़ी सी हिम्मत जुटा के कभी
पुकारने की तमन्ना भी हुई
क्या पता कभी मुड़ कर देख लें
और हमारी अस्तित्व की ध्यान हो जाएं
पर हम कहाँ सपनों में जी रहे हैं
कल है सगाई और आज हम विचार में हैं
अगर यह शर्म और हया के बंधन से
सिर्फ एक लम्हे के लिए मुक्त होकर
आपको अपनी दिल की बात बताते
तो शायद दिल को सुकून मिलता
कि कोई अधूरी कहानी ना रह जाए
इन एकतरफ़ा ख्वाहिशों से कब मेरी आँसू
नींद में बदली पता ना चला।
सवेरे सजना था संवरना था
पर मन कहाँ था
एक आख़री बार खिड़की की तरफ़ गई नज़र
वो ना था बस गया वक़्त गुज़र
नसीब को अपना कर चल पड़ी
नए रिश्ते को स्वीकारने के सिवा चारा नहीं
हमने तो घूंघट भी ना था ओढ़ा
पर वो था सेहरा से ढका
पायल की खनक सुनकर मेरी
जब उन्होंने अपनी पर्दा उठाई
जीने का मकसद फिर से मन में जग उठा
क्योंकि सामने बैठे हँस रहे सैयाँ
वही थे जिनसे रिश्ते में जुड़ने का आस लिए थी बैठी!
-Uma Harish
