मेरी कलम का सार – प्रेम

लिखने बैठा जब भी मैं कोरे कागज़ की तन्हाई पर,
शब्दों ने अपना रूप धरा प्रेम की गहरी गहराई पर।
स्याही की हर बूंद में एक अनकहा सा अहसास मिला,
जैसे तपती धूप में कोई शीतल सा मधुमास मिला।

प्रेम नहीं बस मिलन की बातें, यह तो विरह की अग्नि है,
शून्य को सतरंगी कर दे, यह वह पावन रागिनी है।
लेखक की आँखों से देखो तो प्रेम एक इबादत है,
हृदय के अंतर्मन से निकली रूह की एक इनायत है।

कहीं यह माँ की ममता बनकर आँचल में छुप जाता है,
कहीं पिता के संघर्षों में मौन समर्पण बन जाता है।
राधा के उस इंतज़ार में यह भक्ति का पर्याय बना,
मीरा के विष के प्याले में अमृत जैसा न्याय बना।

दो अजनबियों की आँखों में जब विश्वास का दीप जले,
समझो उसी घड़ी प्रेम की पावन गंगा-धार चले।
यह देह की सीमाओं से परे रूहानी सा एक बंधन है,
जहाँ स्वार्थ का अंत हो वहीं प्रेम का सच्चा नंदन है।

मेरी लेखनी का हर अक्षर बस प्रेम की महिमा गाता है,
कठोर हृदयों की माटी में यह करुणा के बीज बोता है।
गर प्रेम न हो इस सृष्टि में तो शब्द सभी मर जाएँगे,
इंसानियत के सारे सपने पल भर में बिखर जाएँगे।

यही प्रार्थना है ईश्वर से हर दिल में प्रेम का वास रहे,
न कोई दूरी, न कोई दीवार, बस अटूट एक विश्वास रहे।
प्रेम ही अंतिम सत्य है, प्रेम ही जीवन का आधार,
ईश्वर की इस रचना से ही सुंदर सारा यह संसार।

-BRAHMBHATT SHIVANGI PARIXITKUMAR