बुनियाद हो तुम

तुम जब आती हो मन चहकने लगता है,
मेरा घर-आंगन तुम से महकने लगता है।
तवानाई छा जाए ढलती साँसों पर और,
बेसाख्ता दिल भी मेरा धड़कने लगता है।

गुलज़ार हर दिन तुम से, व रातें हैं हसीन,
तुम्हारे होने से जज़्बात बहकने लगता है।
खुमारी बढ़ती जाती वक़्त के साथ-साथ,
खिड़की से यूँ चाँद जब सरकने लगता है।

सुकून घर में है दिलबर मेरे दम से तुम्हारे,
वरना तो यह आग जैसे दहकने लगता है।
तुम्हारे हाथों से करेला भी मीठा लगे मुझे,
तुम न रहो ये पानी भी अटकने लगता है।

तन्हाई घेर ले मुझे, जब तुम रहती हो दूर,
ग़म भी मेरे आस-पास फटकने लगता है।
उचट जाता है मन मेरा, दुनिया-जहान से,
ये क़दम भी इधर-उधर भटकने लगता है।

लगाते हो गले जब, क़रार मिल जाए मुझे,
झूमता गाता है मन भी फुदकने लगता है।
इतराता हूँ मैं, ख़ुशी से फूला नहीं समाता,
मुझ पर जान मेरा यार छिड़कने लगता है।

तुम्हारी मौजूदगी में तनाव छिपाता है मुँह,
दर्द भी सारा धीरे-धीरे खिसकने लगता है।
कि निखरता है ख़ूब मोहब्बत की छाँव में,
तुम्हारे प्यार से चेहरा ये चमकने लगता है।

छनकती पायल तुम्हारी हलचल कर देती,
कहीं शोला सा सीने में भड़कने लगता है।
तुम्हारी हँसी मुनव्वर मेरी ज़िन्दगी कर दे,
तुम थामो जो हाथ, पैर थिरकने लगता है।

भीगने से रोकूँ मैं कैसे भला ख़ुद को जब,
इश्क़ तुम्हारी आँखों में छलकने लगता है।
इक बुनियाद हो तुम मेरे ज़ीस्त की ‘राही’
तुम जो न हो दीवार भी दरकने लगता है।

                                            -Raahi