इरादे मौसम की तरह क्यों बदलते हैं

इरादे मौसम की तरह क्यों बदलते हैं?
जब रहना समान स्थिति में,
फिर योजनाएँ क्यों करते हैं?
पहुँचना नहीं अरमान तक,
तो आगे क्यों बढ़ते हैं?
इरादे मौसम की तरह क्यों बदलते हैं?
खामोशी तब छाती है,
जब अग्रिम विफलता का आभास होता है।
और कल्पना की उड़ान शिथिल पड़ जाती है,
क्षमता जुट नहीं पाने से।
फिर से संभलते हैं,
ख्वाबों से होती हानि,
फिर भी नए प्लान क्यों बनते हैं?
इरादे मौसम की तरह क्यों बदलते हैं।

– Shantanu Mishra