धैर्य और प्रतीक्षा
इम्तिहानों में बैठकर
परिणामों की दौड़ से पिछड़ती
वेटिंग लिस्ट में नाम खंगालकर
डिप्रेशन से दोस्ती में
जान की बाजी लगाकर पंखे से झूलती
कभी गिरकर फिर संभलती
कोचिंगों से लौटकर देर रात तक
लाइब्रेरी में बैठे पन्ने पलटती
अकसर अपनों से दुत्कारी जाती
फेलियर का ठप्पा लगवाकर
दोबारा सेंटरों पर अपना रोल नम्बर ढूंढकर
ओम आर के गोलों में मंजिल तलाशती
कभी पेपरलीक को कोसकर
बंद मकानों में सिसकती
किस्मत पर रोना रोकर
पुलिस की लाठियाँ खाती
डिग्रियों का झौला लेकर
दफ्तरों के चक्कर काटती
जेठ की तपती दुपहरी में पत्थर तोड़कर
चंद रुपयों में संतोष करती
धैर्य का लिबास ओढ़कर “नूर “
मायूसी से मौन होती दो जोड़ी आँखें
जिनमें धैर्य है मौन है
और है अच्छे दिनों की ‘ प्रतीक्षा ‘ ।।
-Nitesh paliwal ‘NOOR ‘
