एक अनदेखा स्पर्श

कौन है वो
जो एक साये की तरह
मेरे दिल की सतह को छूकर
चुपचाप गुजर जाता है —
कभी पास से…
कभी दूर से…

कभी एक धीमी सी आवाज बनकर,
कभी किसी अधूरी धुन की तरह,
कभी एक ऐसे गीत सा, जो सुना तो नहीं,
पर महसूस जरूर किया है…

वो उतर जाता है मेरी रग-रग में
बिना दस्तक दिए…

और फिर उसके ना होने पर
एक अजीब सी खामोशी
मेरे चारों ओर फैल जाती है —
एक सूनापन,
जो सिर्फ कमरों में नहीं,
दिल के भीतर भी गूंजता है…

मैं उसमें डूब जाना चाहती हूँ,
उसे बहुत करीब से जानना चाहती हूँ,
अपनी उँगलियों से
उसके चेहरे को छूकर महसूस करना चाहती हूँ…

क्यों वो मेरे पास होकर भी
मुझसे दूर है…

कभी उसके कदमों की आहट सुनती हूँ,
पलटती हूँ—
तो वक्त जैसे थम जाता है…

मैं उसे देखती हूँ…
और उस एक पल में
खुद को भूल जाती हूँ…

एक तस्वीर बन जाती हूँ,
और फिर
खुद ही एक बुत…

शायद वो कोई शख़्स नहीं,
मेरी ही धड़कनों में जन्मा एक एहसास है—
जो हर बार
मुझे मुझसे ही मिलाने चला आता है…

कभी पास से…
कभी दूर से…

– ध्वनी माहेश्वरी