इश्क की परिभाषा
हम इश्क़ की बात करते हैं, तो इश्क़ क्या है, कैसा होता है,
आज इसकी परिभाषा ही बदल चुकी है।
लोगों ने हवस और मज़े को इश्क़ का नाम दे दिया है,
ये ज़माना भला इश्क़ का मतलब क्या समझ पाया है?
कौन यहाँ असली इश्क़ को अपना पाया है,
इश्क़, प्यार, मोहब्बत की बातें तो करता है हर कोई,
पर कौन यहाँ सच्चा इश्क़ निभा पाया है?
लैला–मजनूँ और कबीर सिंह के इश्क़ को देखने वाला है आज का दौर,
पर कौन इश्क़ की परिभाषा को अपनी ज़िंदगी में उतार पाया है?
इश्क़ सिर्फ़ एक शब्द नहीं, इश्क़ तो इबादत है,
प्यार की ख़ातिर प्यार को क़ुर्बान कर देना ही सच्ची शहादत है।
इश्क़ को जानना हो तो बस एक नज़र घुमाकर देखो,
सती के जाने पर जो वैराग्य को अपना ले, वही सच्चा इश्क़ कहलाए।
महादेव-सा इश्क़ यहाँ कौन कर सकेगा?
कलयुग के इन आशिक़ों में कौन साथी के जाने पर वैराग्य में उतर सकेगा?
कौन यहाँ इश्क़ का दर्द सह पाएगा,
कौन कृष्ण-सा राधा को किसी और का होते देख पाएगा?
कौन आज इस क़दर का इश्क़ निभा पाएगा
कि मुकम्मल न होकर भी राधा-कृष्ण-सा मिसाल बन जाए?
इश्क़ को इश्क़ से हटाकर एक हथियार बना लिया है,
कलयुग ने सच्चे इश्क़ को बेकार बना दिया है।
इश्क़ तो वो इबादत है ख़ुदा की,
जिसमें जहाँ को जीतने की ताक़त है,
पर ये ज़माना आशिक़ों के मुखौटों में छुपे लोगों का है—
किसमें है इतनी हिम्मत कि इस इबादत को हक़ीक़त बना सके?
_Ansh sharma
