इश्क़ की तिलावत

तेरा ज़िक्र लबों पर आए तो सदियों की ख़ामोशी टूटती है,
जैसे रूह की तहों में दबी कोई सदाएँ जाग उठती हैं।
ये सिर्फ़ याद नहीं, कोई पुरअसरार तअल्लुक़ है शायद,
जो हर धड़कन में बेआवाज़ इबारत-सा लिखा मिलता है।
तेरा नाम मेरी तन्हाई की तिलावत बन जाता है,
जहाँ हर लफ़्ज़ एक गुमनाम सुकून में ढल जाता है।
लोग समझते हैं यह महज़ एक गुज़रता एहसास है,
पर उन्हें क्या ख़बर, ये रूह का सबसे गूढ़ अफ़साना है।

इश्क़ वो नहीं जो अल्फ़ाज़ में बयान हो जाए,
इश्क़ वो है जो ख़ामोशी में भी सदाएँ बन जाए।
तेरी नज़र का असर कुछ यूँ दिल पर उतरता है,
जैसे कोई पुरानी दुआ अचानक क़ुबूल हो जाए।
तेरी तरफ़ उठता हर ख़याल एक इबादत लगता है,
जहाँ दिल अपना वजूद भी भुला देता है।
ये कैसी आतिश है जो रूह के साए में जलती है,
जिसमें फ़ना होकर भी इंसान मुकम्मल हो जाता है।

तक़दीर भी अजीब दस्तकार है रिश्तों की,
जो अनजानी राहों में मुक़द्दर के धागे बुनती है।
दो रूहों को एक लम्हे में हमराज़ बना देती है,
और फिर सदियों तक उन्हें तलाश में छोड़ देती है।
शायद तेरा और मेरा रिश्ता भी ऐसा ही कोई राज़ है,
जो सितारों की लकीरों में बेआवाज़ लिखा गया है।
हम बस दुआओं की तरह एक-दूसरे में बसते हैं,
और ज़माना उसे महज़ इत्तेफ़ाक़ समझता है।

अगर मिलना मुक़द्दर में लिखा है कहीं,
तो फ़ासले भी एक दिन रास्ते बन जाएँगे।
जो इश्क़ रूह की गहराइयों से जन्म लेता है,
वो देर से सही मगर मुकम्मल ज़रूर होता है।
उस रोज़ शायद हमें यह भी समझ आ जाएगा,
कि इंतज़ार भी इश्क़ की एक मुक़द्दस रस्म थी।
हर अधूरी दुआ, हर तन्हा रात, हर भीगा लम्हा,
दरअसल उसी मुकम्मल सहर की तैयारी थी।

                              -Sohana Anjum