इश्क या कुछ और

या कुछ और…
तू उसे इश्क करता हे या कुछ और,
वो इश्क समझता है या कुछ और,
रोज़ नए-नए फसाने तैयार होते है,
ये हादसा बनेगा या कुछ और,
मेरा ही इम्तिहान इतना क्यों,?
तू जिंदगी हे या कुछ और,
मैं पेड़ हु सब के काम आता हूं,
तू आराम कर या कुछ और,
चलो,फिर से एक नए सफर पर,
फिर मंजिल मिले या कुछ और,
हरदफा इश्क़ गलत हो ये ज़रूरी नहीं,
चाहे अश्क बहे या कुछ और,
तेरी हर बात को बारीकी से नहीं लेता में,
तू आज कुछ लगे कल कुछ और,
में बारिश हु बरस जाऊंगा,
तू भीग या कुछ और…
हेलीक…

        _Bharat Kapadiya”helik”