कल्पना और समर्पण
बन गया यदि मैं भोर
बन गया यदि मैं भोर ,
मेरा सकुून भरा शाम बनोगी क्या?
बन गया यदि मैं वक्षृ ,
मेरा रसीला आम बनोगी क्या?
वसे तो नहीं हु मैं ब्रम्हचारी;
पर बनू यदि मैं सन्यासी,
तुम मेरी धाम बनोगी क्या?
बनता यदि मैं हनुमान;
रहना चाहता मैं भक्त तुम्हारा,
तुम मेरे राम बनोगी क्या?
वसे तो नहीं हु मैं मूल्यवान;
पर बनू यदि मैं कोई वस्तु,
खरीद न सके कोई;
ऐसा दाम बनोगी क्या?
हुआ यदि मेरा पुनर्जन्म,
तुम मेरा नया नाम बनोगी क्या?
बाते नहीं हो पाती ;
इच्छाएं दबी रह जाती,
देखना चाहूं स्वप्न तुम्हारा;
मगर नींद ही नहीं आती।
कर सकू मैं जिससे अपनी बातें,
तुम मेरी वो शाम बनेगी क्या?
-प्रजापति कुणाल
