कवि की दो दुनियाँ

कवि की सच्चाई ……..

लिखू तुझे तो पूर्णिमा का चाँद है तू ,

सच कहू कवि तो अमावस्या की रात है तू ,

लिखू तुझे तो वसंत है बहार है तू ,

सच कहू तो पतझड़ की डाल है तू ,

लिखू तुझे तो मोहब्बत है तू ,

सच कहू तो जिंदगी की भूल है तू ,

लिखूं तुझे तो याद है तू ,

सच कहू तो बीते कल की फरियाद है तू ,

लिखूं तुझे तो सवेरे की पहली किरण है तू ,

सच कहूँ तो ख़तम होती शाम है तू ,

लिखूं तुझे तो मंजिल है तू

सच कहूँ तो राह मिला मुसाफिर है तू ,

लिखूं तुझे तो सुकून है तू

सच कहूँ मेरी जिंदगी का शोर है तू ,

लिखूं तुझे तो प्रेम की पूजा है तू ,

सच कहूँ तो जादू तो है तू ,

लिखू तुझे तो शायर है तू ,

सच कहूँ तो शिकायत है तू ,

-Sakshi Prakash Jaiswal