मैं प्रेम हूँ—
मैं प्रेम हूँ—
कोई कहानी नहीं,
कोई अधूरी चाह नहीं,
मैं वह संपूर्णता हूँ
जो टूटकर भी पूरी रहती है।
मैं जन्म लेती हूँ
माँ की पहली धड़कन में,
जब वह अपने हिस्से की नींद
किसी और की साँसों को दे देती है।
मैं बहन की चुप प्रार्थना हूँ,
जो राखी के धागे में
सुरक्षा नहीं, विश्वास बाँधती है।
मैं बेटी की मुस्कान हूँ,
जो विदा की भीगी पलकों में भी
घर की खुशियाँ छोड़ जाती है।
मैं स्त्री हूँ—
मुझे अक्सर समझा गया
कमज़ोर, भावुक, बंधी हुई,
पर मैं ही वह शक्ति हूँ
जो घर को संसार बनाती है।
मैं पत्नी के धैर्य में बसती हूँ,
जहाँ शिकायतों से अधिक
समर्पण बोया जाता है।
मैं वह प्रतीक्षा हूँ
जो देर रात की दस्तक पर
थकी आँखों में उजाला भर देती है।
मैं प्रेम हूँ—
मैं पाने की नहीं,
निभाने की भाषा जानती हूँ।
मैं टूटती भी हूँ,
पर बिखरती नहीं;
आँसू पीकर भी
दूसरों को हँसना सिखाती हूँ।
मुझमें त्याग है,
पर हार नहीं;
मुझमें समर्पण है,
पर स्वाभिमान भी।
मैं सीमाओं में कैद नहीं,
मैं आकाश की तरह विस्तृत हूँ;
मुझे बाँधने की कोशिश करोगे
तो मैं दुआ बनकर उड़ जाऊँगी।
मैं प्रेम हूँ—
जिसे समझना आसान नहीं,
पर जिसे महसूस कर लिया जाए
तो जीवन सरल हो जाता है।
मैं वही शक्ति हूँ
जो युद्धों को शांति में बदल दे,
घृणा को करुणा में,
और पत्थर दिलों को
धड़कन दे दे।
मैं प्रेम हूँ—
न स्त्री, न पुरुष,
पर हर हृदय की सच्ची पहचान।
-Ramchander Kashyap
