प्रेम: एक शाश्वत परिभाषा

प्रेम ही आदि है, प्रेम ही इस जग का आधार है,
प्रेम ही शून्य है, प्रेम ही अनंत विस्तार है।
प्रेम ही मौन की भाषा, प्रेम ही रूह का संगीत,
प्रेम ही हार में छिपी, एक बहुत बड़ी जीत है।

प्रेम ही वह दीया है, जो अमावस में जलता है,
प्रेम ही वह साहस है, जो अंगारों पर चलता है।
प्रेम ही कस्तूरी की खुशबू, जो मन को महकाती है,
प्रेम ही वह याद है, जो सोते में भी जगाती है।

प्रेम ही तपस्या है, प्रेम ही मन का मंदिर है,
प्रेम ही वह कश्ती है, जिसका साथी समंदर है।
प्रेम ही कोरे कागज़ पर, स्याही का एक कतरा है,
प्रेम ही वह साहस है, जिसमें कोई न खतरा है।

प्रेम ही त्याग की मूरत, प्रेम ही परोपकार है,
प्रेम ही रूखे जीवन में, सावन की बौछार है।
प्रेम ही धड़कन की गति, प्रेम ही सांसों की डोरी,
प्रेम ही वह चाँदनी है, जो रात चुरा ले चोरी-चोरी।

प्रेम ही मीरा का विष, जो अमृत बन जाता है,
प्रेम ही वह धागा है, जो दुश्मन को भी जोड़ पाता है।
प्रेम ही राधा की प्रतीक्षा, प्रेम ही कान्हा की बाँसुरी,
प्रेम ही वह पूर्णता है, जो लगती नहीं अधूरी।

प्रेम ही ओस की बूंद, जो पत्तों पर सोती है,
प्रेम ही वह कीमती माला, जो हृदय में पिरोती है।
प्रेम ही आँखों का काजल, प्रेम ही ललाट की बिंदी,
प्रेम ही सबसे सुंदर भाषा, जैसे लगती है हिंदी।

प्रेम ही समर्पण की पराकाष्ठा, प्रेम ही विश्वास है,
प्रेम ही हर भूखे हृदय की, एक तृप्त प्यास है।
प्रेम ही वह मरहम है, जो हर घाव भर देता है,
प्रेम ही वह ईश्वर है, जो सबको वर देता है।

प्रेम ही ब्रह्मांड का स्पंदन, प्रेम ही आदि संकल्प है,
प्रेम ही अस्तित्व की गरिमा, प्रेम ही अंतिम विकल्प है।
प्रेम ही जड़ में निहित चेतन, प्रेम ही तत्व का सार है,
प्रेम ही निस्तब्ध अंतर्मन का, सबसे प्रखर विचार है।

प्रेम ही अनुभूतियों की गंगा, प्रेम ही पावन धार है,
प्रेम ही तमसा को चीरती, ज्योति का विस्तार है।
प्रेम ही वह मौन तपस्या, जो शब्दातीत रहती है,
प्रेम ही वह मरु-सरिता, जो प्राणों में बहती है।

प्रेम ही निस्वार्थ अर्पण, प्रेम ही अक्षुण्ण विश्वास है,
प्रेम ही क्षितिज के पार वाली, एक धुंधली सी आस है।
प्रेम ही वह बीज-मंत्र, जो हृदय-भूमि में फलता है,
प्रेम ही वह सूर्य-तेज, जो अज्ञान-अंधेरे को छलता है।

प्रेम ही वह महाकाव्य, जिसे रूह ने है लिखा,
प्रेम ही वह शास्त्र, जिसने त्याग का पथ है सिखा।
प्रेम ही वह गंध-कुसुम, जो मन-उपवन महकाता है,
प्रेम ही वह सेतु, जो दो भिन्न ध्रुवों को मिलाता है।

प्रेम ही वैराग्य की शांति, प्रेम ही गृहस्थ का सुख है,
प्रेम ही वह संबल, जो हर लेता जग का दुःख है।
प्रेम ही वह दिव्य विधा, जो ईश से साक्षात्कार है,
प्रेम ही नश्वर देह में, अमरता का सत्कार है।

प्रेम ही आत्म-मंथन का अमृत, प्रेम ही संचित पुण्य है,
प्रेम ही वह इकाई, जिसके बिना ये सृष्टि शून्य है।
प्रेम ही मर्यादा की सीमा, प्रेम ही असीम विस्तार है,
प्रेम ही इस मर्त्य लोक का, सबसे भव्य उपहार है।

प्रेम ही वह मंत्र बनाओ, जिससे कलुषित मन धुल जाएँ,
प्रेम ही वह द्वार बने, जहाँ बैर के बंधन खुल जाएँ।
प्रेम ही वह अंतिम गंतव्य, जहाँ मानवता का मान हो,
प्रेम ही वह संस्कृति बने, जो राष्ट्र की पहचान हो।

      -DINESH SURESH BHADANE