"प्रेम ही परमात्मा"
प्रेम कोई शब्द नही, एक अनुभव है गहरा,
जैसे नदी का जल हो, निर्मल और ठहरा।
न बंधा जा सके इसे, किसी भी बंधन में,
यह बसता है हर पल, हर साँस के क्षण में।।
जब पहली बार धरती ने ओढी हरियाली,
तब प्रकृति ने सिखाया, प्रेम की निराली ।
फूलो ने पूछा भंवरे से- तू क्यों आया ?
भाँवरे ने कहा -बस प्रेम ने मुझे बुलाया।।
यह प्रेम ही तो है जो बादल को रुलाता,
धरती की प्यास बुझाने वह नीचे आ जाता।
बिना मांगे बरसे, बिना शर्त के निभाए ,
यही सच्चा प्रेम है, जो देकर मुस्काए।।
माँ भारती की माटी में जो सुगंध है भरी,
वह प्रेम की ही भाषा है, अनकही, अधूरी।
हर पर्वत , हर नदी, हर वन की पुकार,
प्रेम का ही दूसरा है, एक विशाल संसार ।।
गंगा बहती जाती है, बिना थके, बिना रुके,
जैसे माँ का आँचल हो, कभी न हो झुके।
उसकी धारा में मिला है, सदियों का प्यार,
यही प्रेम है जो करता, जीवन को साकार।।
हिमालय खड़ा है जैसे, एक मौन प्रहरी,
प्रेम की भाषा बोले, गूंगी पर गहरी।
न बोले एक शब्द, पर कहता सब कुछ,
प्रेम में होता है यही-मौन का सुख।।
ईश्वर ने जब स्रष्टि रची, प्रेम से रची,
हर कण में उसकी झलक, गहरी और सच्ची।
सूरज उगता है प्रेम से, प्रेम से ढलता,
इसीलिए हर सुबह जीवन नया मिलता ।।
प्रेम वह दीपक है जो अँधेरे में जले,
बिना तेल, बिना बाती, फिर भी न पिघले ।
जब ईश्वर का प्रेम हो, मन में समाया,
तब हर पत्थर में भी, उसे मैंने पाया।।
भक्त और भगवान के बीच जो धागा है,
वह प्रेम का ही बुना हुआ, अनमोल धागा है।
मीरा ने नाचा, कबीर ने गाया जो राग,
प्रेम की उस आग में था, मोक्ष का सुभाग।।
हे प्रेम! तू ही ब्रह्म है, तू ही है माया,
तुझमें ही खोया जगत, तुझमें ही समाया।
जो तुझको जान ले, वो म्रत्यु से न डरे,
प्रेम में जो डूब जाए, वो जीते जी तरे।।
इस माटी से उठा हूँ , इस माटी में मिलूँगा ,
माँ भारती के चरणों में, अपना शीश झुकाऊँगा!
यही प्रेम की पराकाष्ठा, यही जीवन का सार,
प्रेम ही ईश्वर है-और ईश्वर ही प्रेम का आधार।।
कवी:- श्री. नदनेश सुरेश भदाण
