प्रेम का मौन निमंत्रण
शीर्षक: प्रेम का मौन निमंत्रण
प्रेम नहीं है केवल शब्द, न वादों का अंबार है,
यह तो दो रूहों के बीच, एक गहरा इकरार है।
जैसे कोरे कागज़ पर, स्याही का झुक जाना,
जैसे तपती धूप में, ठंडी छाँव का मिल जाना।
कभी ये मीरा की भक्ति है, कभी कान्हा की बाँसुरी,
कभी ये अधूरी कहानी है, जो फिर भी है पूरी।
इसमें न कोई शर्त होती, न कोई व्यापार है,
सच्चा प्रेम तो बस, समर्पण का ही सार है।
तुम पूछती हो प्रेम क्या है?
हवाओं में घुली हुई, उस महक का एहसास है।
बिन कहे जो सुन लिया जाए, वो जज़्बात है,
अँधेरी काली रातों में, जुगनू वाली बात है।
वो जो तुम मुस्कुराती हो, बिना किसी बात के,
वो जो हम साथ चलते हैं, थामे हाथ हाथ के।
वही तो प्रेम है, जो आँखों से बह जाता है,
बिना ज़ुबाँ हिलाए, सब कुछ कह जाता है।
न इसमें ज़ोर चलता है, न कोई ज़बरदस्ती है,
ये तो रूह की रूह से, एक पावन सी मस्ती है।
फासले जितने भी हों, दिल हमेशा पास रहते हैं,
सच्चे प्रेमी तो खामोशी में भी, बहुत कुछ कहते हैं।
ये दरिया है इबादत का, जिसमें डूबना ही तरना है,
प्रेम तो वो जज़्बा है, जिसमें जी कर ही मरना है।
न कोई सीमा इसकी, न इसका कोई अंत है,
प्रेम अगर पतझड़ भी हो, तो मन में सदा वसंत है।
_Bhaskar Vyas
