समाज का आईना

हैं इलज़ाम मुझ पर कि चाल धीमी है मेरी,
कहते हैं , लहजा बदलो, ये सरज़मीं  नहीं तेरी।
परदानशीं नहीं चाहे यहाँ कोई भी चेहरा,
मगर आईने से ही क्यों इतनी अदावत है मेरी

नफ़्सियाती मरीज़ है यहाँ हर एक नौजवान,
बेरोज़गारी की धूप में जलता उसका हर एक अरमान।
डिग्रियों के ढेर हैं, मगर रोज़गार नहीं,
उम्मीदों का शहर है, मगर कोई दरबार नहीं।
दवा देने वाला तबीब भी यकआयक कहने लगा,
मरहम की जगह किस्सों से दिल बहलने लगा,
और कह गया मुस्कुराकर  –
“हुज़ूर, ये ज़माना आपके लिए नहीं बना।”

कभी सोचता हूँ
ये ज़ुबान क्यों दी ख़ुदा ने मुझे,
जब सवाल करना ही गुनाह था यहाँ?
क्यों दी ये बेचैनी, ये सोच, ये आग,
जब सच बोलने पर ही मिलता है हर एक दाग?
यहाँ ग़रीबी भी ख़ामोश है, और इंसाफ़ भी,
यहाँ औरत की चीख़ दब जाती है रिवाज़ों में कहीं।
यहाँ सियासत वादों के आईने सजाती है रोज़,
मगर भूखे पेट को मिलता नहीं कोई एक रोज ।
मगर सुनो –
अगर आईना हूँ मैं, तो दिखाऊँगा चेहरा वही,
जो छुपाते हो तुम पर्दो में कई।
मेरी चाल धीमी सही, पर ठहरी नहीं,
मेरी ज़ुबान ख़ामोश हो जाए –  ये मुमकिन नहीं।
क्योंकि समाज का आईना हूँ मैं,
टूट भी जाऊँ तो टुकड़ों में सच दिखाऊँगा,
और हर टुकड़ा पुकारेगा –
सवाल करना गुनाह नहीं,
सवाल ही बदलाव की पहली आहट है यहाँ।

                                          _Niloffer