शिव का अकथित प्रेम

भक्ति अधूरी प्रेम बिना,
सती अधूरे शिव है।
सती ही शिव का पूर्ण रूप,
अपूर्ण, बिना वह शिव है।

तप और त्याग माँ सती का हमने,
अमिट , असीम, अनुपम था सुना।
औघड़दानी की प्रेम कथा को,
कैसे कर दें हम अनदेखा?

आत्म दाह जो किया सती ने,
शिव का अंतर्मन दग्ध हुआ।
उस दग्ध हृदय की चिंगारी से,
शिव ने सृष्टि का ध्वंस किया।

काम को वश में करने वाले,
प्रेम अधीन हो विलाप करे।
शांत, श्वेत और निर्मल शिव,
क्रंदन कर तांडव नृत्य करे।

देख सती के जले देह को,
नीर नयन से खूब बहे।
तपते हृदय की अग्नि से,
वे प्रेम विवश हो शून्य पड़े।

एकांत ध्यान मग्न रहने वाले
धरती अम्बर को गुंजा रहे।
सती शव को लिए हाथों में,
विरह व्यथा को डरा रहे।

सती देह की भस्म देह पर,
शिव औघड़दानी लगा रहे।
जैसे मानो आभूषण से वे,
अपने आप को सजा रहे।

सजा देह सती देह से शिव का,
शिव शक्ति में लीन हुए ।
हृदय समाधि स्थल बन चुका,
वर्ष हजारों बीत गए ।

तप त्याग और तांडव शिव का,
पार्वती रूप में प्रकट हुआ।
प्रेम हो गया प्रेम मग्न जब,
तब शिव से शिव का मिलन हुआ।

महा विरह से महा मिलन तक,
शिव ने भी सही थी उर की पीड़ा।
शक्ति शिव का अकथित प्रेम है,
शिव है शक्ति की प्रेम कथा ।

                    -पूजा शर्मा