‘शुक्रिया ’ — जो कभी कह न सकी

मैं हमेशा उन प्यार भरे शब्दों को ढूँढ़ती रही
जिनसे मैं आपको शुक्रिया अदा कर सकूँ।
मेरे काँपते क़दमों को थाम लेने के लिए,
उस चलन के लिए जो आपने सिखाया—
तेज़ भी, सीधा भी,
ताकि धरती भी मुझे ठेस पहुँचाने से हिचके।
मैंने आपको कभी कुछ नहीं कहा—
उस धूप के लिए जो आपकी मुस्कराहट से झलकती थी।
आपके उस सन्नाटे के लिए
जो मेरे मन में चल रहे तूफ़ानों को शांत करता था।
‘मछली के झोल’ की उस सुगंध के लिए
जो हमारी छोटी-सी रसोई से आशीर्वाद की तरह फैल जाती थी,
जिसमें नमक के साथ आपके त्याग का स्वाद भी घुला होता था।
नींद भरी सर्द सुबहों में मुझे स्कूल तक छोड़ आने के लिए,
और छुट्टी की घंटी बजते ही फाटक पर मेरा इंतज़ार करने के लिए।
‘अमर चित्र कथा’ के लिए,
जो आप किताबों की दुकान से लाती थीं।
तब मैं कुछ कह न सकी—
मेरे शब्द संकोची थे।
पर आज,
जब मैं अपने बच्चे की उँगलियाँ पकड़ती हूँ,
जब मैं खाना बनाती हूँ,
जब उसकी छोटी-छोटी कल्पनाओं की कहानियाँ सुनती हूँ—
तब मैं आपको शुक्रिया अदा करती हूँ—
आप बनकर।

                   -INDRANIL BANERJEE