“तहज़ीब-ए-मोहब्बत”

ये मोहब्बत है जनाब, इसे तजुर्बा कहिए,
जो मिला भी तो उम्र-भर का फ़साना कहिए।
उसने देखा तो लगा, वक़्त ठहर जाएगा,
एक लम्हे को भी अब पूरा ज़माना कहिए।
बात लब तक जो न आई, वही असली थी शायद,
हर कही बात को क्या दिल का ठिकाना कहिए।
हमने चाहा है उसे, रिवायतों में रहकर,
जो मिला क़िस्मत से, बस वही अफ़साना कहिए।
साथ होना ही मुहब्बत की शर्त कब ठहरी,
दूर रहकर भी जो निभे, उसे निभाना कहिए।
इश्क़ लिखता है जो ख़ामोशी की स्याही से,
उसके हर लफ़्ज़ को “तहज़ीब-ए-मोहब्बत” कहिए।
                                    ✍️ साधना सिंह