वह था मोह, तुम हो प्रेम
उसकी आँखें मोह लेती थी
तुम्हारी , प्रेम टोह लेती है
मोह उसके साथ की थी प्यासी
प्रेम की नजरें तो बाट जोह लेती है ।
वह थी मात्र एक भ्रम
तुम मेरे जीवन का क्रम
तब वह और मैं थे
अब मैं नहीं , बस हैं हम ।
तब था शब्दों का प्रवाह
अब नेत्र ही है वार्ता की राह
वह तो था बस व्यापार
पर प्रेम में है ना कोई चाह ।
वह प्रत्यक्ष थी तो भी थी मूरत
तुम मूरत, फिर भी हर पल हो दिखत
मैं पथिक था , वह थी पथ में शीला
अब तुम्हे पंख बनाकर , उड़ान बनी मेरी आदत ।
वह प्रेम के गुण बस कहती थी
तुम प्रेम के गुणों में बहती हो
मुझे तुमने पत्थर से पहाड़ बनाया
हर पल मेरे कण कण में रहती हो ।
अब प्रेम-मोह में अंतर समझता हूँ
उसे तन के तुम्हें मन के पास रखता हूँ
तुमने जीवन ढाई अक्षर का बनाया
मैं न अब मोह की अग्नि में धधकता हूँ ।
-Gaurav Garg
