“वो हल्का-सा बचपन”

बचपन का वो भारी बैग
ज़िंदगी की टेंशन से हल्का था,
धूल भरी राहों में दौड़ते हम
हर मंज़िल से पहले मासूम-सा छल्का था।
किताबों का वज़न कंधों पर
मगर दिल बिल्कुल बेफ़िक्री से भरा था,
आज फ़ाइलों के ढेर तले दबकर
हर ख़्वाब आधा-अधूरा सा मरा-मरा था।
तब चॉकलेट की ख़ुशियों से
पूरा दिन मसर्रत में ढल जाता था,
अब मुस्कुराने का वक़्त भी
कैलेंडर की तारीख़ों में कहीं खो जाता था।
काश फिर से वही स्याह शामें,
वो गिल्ली-डंडा, वो पतंगों का जश्न लौट आए,
क्योंकि बचपन का हर छोटा लम्हा
आज की पूरी उम्र से ज़्यादा
क़ीमती और रोशन नज़र आए।
अब समझ आता है —
सादगी ही असल दौलत थी,
दो रोटियों में भी इशरत थी,
और नींद इतनी गहरी
कि ख़्वाब भी मुस्कुरा कर आते थे।
न कोई रक़ाबत, न कोई अदावत,
बस मिट्टी में लिपटी दोस्ती की शरारत थी,
आज महलों में रहकर भी
वो टूटी चौखट ज़्यादा राहत थी।
ए ज़िंदगी, अगर सुन सके तू,
थोड़ा-सा वो बचपन उधार दे दे,
थकी हुई इस रूह को फिर से
मासूम-सा इक इतवार दे दे।

          _GAURAV VERMA